पांच राज्यों में चुनाव तारीखों का ऐलान होने से तीन दिन पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जाति-धर्म के नाम पर वोट मांगने को गैरकानूनी करार दिया, इसके बावजूद दल जाति-धर्म की सियासत नहीं छोड़ पा रहे। उप्र में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने उम्मीदवारों की जो सूची जारी की, उसका जातिवार ब्योरा दिया। हालांकि, यह भी कहा कि वे जाति की राजनीति में विश्वास नहीं रखते। देश की राजनीति में आजादी के बाद से जाति की जो राजनीति चली वह 1977 और उसके बाद 1989 में मंडल आयोग के बाद से हावी रही है। इस सबके बीच प्रदेश में कुछ ऐसे नेता भी रहे, जिन्होंने जातियों की सीमाएं लांघकर राजनीति का शिखर छुआ।

मोहनलाल सुखाडिया

राजस्थान में सबसे ज्यादा समय 17 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहने का कीर्तिमान। जाति से जैन, लेकिन सर्वजातियों में स्वीकार्यता रही। मुख्यमंत्री बनने से पहले तीन बार राजस्थान में मंत्री रहे। इसके बाद लोकसभा के सांसद और तीन राज्यों में राज्यपाल बने।

भैरोंसिंह शेखावत
राजपूत, लेकिन राजस्थान में अब तक सबसे बड़े जनाधार वाले नेता माने जाते हैं। 1987 में रूपकंवर सती प्रकरण के विरोध में सबसे बुलंद आवाज बने। 1952 के पहले आम चुनाव से 1998 तक दस बार विधायक चुने गए। दांतारामगढ, श्रीमाधोपुर, किशनपोल, छबड़ा, आमेर, धौलपुर, बाली से विधायक बने। उपराष्ट्रपति, तीन बार मुख्यमंत्री बने। एक बार राज्य सभा सदस्य बने।

शिवचरण माथुर :

मध्यप्रदेश में जन्मे, लेकिन राजनीति का क्षेत्र राजस्थान रहा। जाति से कायस्थ, निर्वाचन क्षेत्र में जाति का प्रभुत्व कम, लेकिन भीलवाड़ा की मांडलगढ़ सीट से सात बार विधायक। दो बार राजस्थान के मुख्यमंत्री। दो बार भीलवाड़ा सांसद।

वसुंधरा राजे :

मध्यप्रदेश के सिंधिया ग्वालियर राजघराने की बेटी, धौलपुर के जाट राजपरिवार की बहू बनी, लेकिन राजनीतिक कर्मस्थली बनाया झालावाड़ को। झालावाड़ से पांच बार सांसद, केंद्र में मंत्री, दूसरी बार राजस्थान की मुख्यमंत्री, राजस्थान में भाजपा को पूर्ण बहुमत में लाने वाली पहली नेता, चौथी बार विधायक।

अशोक गहलोत :

जाति से माली लेकिन जोधपुर लोकसभा सीट से पांच बार लोकसभा के लिए चुने गए, केंद्र में मंत्री रहे, दो बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। चार बार विधायक। आज राजस्थान में कांग्रेस के कद्दावर नेता के रूप में पहचान बना चुके हैं।

ये भी दिग्गज : कैडर की राजनीति छोड़ बनाई पहचान

राजबहादुर : कायस्थ, जिसके वोट मुट्ठी भर, लेकिन जाटों के गढ़ भरतपुर से तीन बार दूसरी, तीसरी और पांचवीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। पहली बार जयपुर-सवाईमाधोपुर सीट से पहली लोकसभा के सांसद बने। 1951 से 1976 तक उप मंत्री से काबिना मंत्री तक रहे। एक बार भरतपुर से विधायक बने।

प्रो. केदार शर्मा-ब्राह्मण, लेकिन गंगानगर सीट से निर्दलीय, समाजवादी पार्टी, जनता पार्टी, जनता दल जैसे दलों से छह बार विधायक, दो बार भैरोंसिंह शेखावत सरकार में मंत्री रहे। अपनी सादगी और सहजता के लिए जाने जाते रहे।

प्रद्युम्न सिंह :वैश्य, राजाखेड़ा से आठवीं बार विधायक। क्षेत्र में ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जरों की बहुलता। अपनी जाति के वोट नगण्य। 1967 से 2003 तक विभिन्न चरणों में चार बार उपमंत्री से लेकर काबिना मंत्री। आठ बार विधायक बने।

गिरधारीलाल भार्गव : नवीं से चैदहवीं लोकसभा में छह बार जयपुर सीट से लगातार सांसद चुने गए। इससे पहले तीन बार हवामहल और किशनपोल से विधायक। जिसका कोई ना पूछे हाल उसके संग गिरधारीलाल- नारा पहचान था।

चंदनमल बैद : वैश्य, तारानगर सरीखी जाट-राजपूत बहुल सीट से 4 बार व चार बार ही सरदारशहर सीट से विधायक। क्षेत्र के मतदाताओं पर पूर्ण प्रभुत्व। हीरालाल देवपुरा, अशोक गहलोत समेत कई सीएम के मंत्रिमंडल में रहे। सबसे लंबे समय तक राजस्थान के वित्त मंत्री रहने का कीर्तिमान।

बद्रीप्रसाद गुप्ता : वैश्य, अपनी जाति के वोट मुट्ठी भर, गुर्जर-यादव बहुल अलवर की बानसूर विस सीट से छह बार विधायक, मोहनलाल सुखाड़िया और जगन्नाथ पहाड़िया की सरकारों में काबिना मंत्री रहे।

श्रीचंद कृपलानी :
जाति से सिंधी, लेकिन चित्तौड़गढ़ जैसी सीट से सांसद बने और निंबाहेड़ा से विधायक, वर्तमान
में वसुंधरा सरकार में काबिना मंत्री।

शोभाराम : हीरालाल शास्त्री, मोहनलाल सुखाड़िया और बरकतुल्ला खां मंत्रिमंडलों में मंत्री रहे। रामगढ़ और थानागाजी से तीन बार विधायक रहे। दो बार अलवर से लोकसभा के लिए निर्वाचित।

साभार – दैनिक भास्कर

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here