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कहते हैं कि अधर्म, बुराई और पाप की हमेशा हार होती है, और धर्म, सच्चाई, सुकर्म की विजय। ये बातें अगर सभाओं या आलेखों में कही जाए तो सबकों पसंद आती है। लेकिन शायद इस समाज और देश के वासियों का अब इनसे कोई सरोकार नहीं रह गया है। अभी हाल ही की घटना है। राजस्थान के नागौर ज़िले का एक कुख़्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह जिसने अनेकों लोगों को बेदर्दी से मारा वह पुलिस की साहसी और जवाबी कार्यवाही में मारा जाता है। लेकिन बुराई, असामाजिकता और अमानवीयता के खात्में पर भी अनेक लोग ख़ुशी नहीं मनाते। यहाँ कुछ लोग लाइमलाइट में आने के लिए तो कुछ अपनी राजनीति चमकाने के लिए हमारी पुलिस की बहादुरी का और सरकार की सक्षमता का विरोध करते है। जात-पात और क्षेत्र-इलाके के नाम पर देश को बांटने वाले कुछ लोग यहाँ आज भी अपनी बिसात बिछाये बैठे है।

एनकाउंटर को फ़र्ज़ी बताने वाले ज़रा अपना ज़मीर जगाये:

कुल तीन दर्ज़न से भी ज़्यादा आपराधिक मुकदमों का आरोपी, जो पिछले डेढ़ साल से हमारी पुलिस और प्रशासन से आंखमिचौली खेल रहा था उसे राजस्थान का जांबाज़ पुलिस बल ढूंढ निकालता है। महीने भर पहले पुलिस को पता चल जाता है कि आनंदपाल इस जगह छिपा हुआ है। उसकी क्रूरता और आपराधिक गतिविधियों से परिचित पुलिस उसपर निगरानी रखती है, ताकि उसे सही सलामत पकड़ सकें। इसके लिए एक दिन पुलिस सही मौका देखकर उसके ठिकाने पर जाकर उसे गिरफ्तार करने की योजना बनाकर उसके ठिकाने को घेर लेती है। पुलिस जवानों द्वारा बार-बार घोषणा की जाती है, कि ”आनंदपाल क़ानून के आगे सरेंडर कर दो।” लेकिन क़ानून को महज़ मज़ाक समझ बैठा यह गैंगस्टर अपने आप को सरेंडर नहीं करता। उलटे पुलिस के ऊपर फायरिंग करने लगता है। एक अपराधी की गोली से शहीद होने से अच्छा, समाज के लिए घातक बन चुके उस दरिन्दे को मिटाना होता है। कुछ यहीं सोचकर पुलिस ने अपना काम किया। और आख़िर में आनंदपाल की ताबड़तोड़ गोलीबारी का सामना करते हुए सोहन सिंह नाम के एक कमांडों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए गैंगस्टर आनंदपाल को मार गिराया।

कालजयी सोहन सिंह के लिए आपकी संवेदनाएं क्यों नहीं जगती:

आनंदपाल की गोलियों से घायल कमांडों सोहन सिंह आज भी गंभीर हालत में एक अस्पताल के वार्ड में ज़िन्दगी और मौत के दौराहे पर खड़ा है। सोहन सिंह, एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन में किसी का बुरा नहीं किया। कोई अपराध नहीं किया। देशसेवा को सर्वोपरि मान जिसनें पुलिस ज्वॉइन की। अपने देश और देशवासियों की सोचने वाला एक जवान, प्रदेश के लोगों के लिए डर का कारण बन चुके एक गैंगस्टर के खात्में में खुद साँसों और धड़कनों की उलझनों के बीच अटक गया है। लेकिन अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति के हिमायती बन रहे लोगों के मन में इस जांबाज़ के लिए कोई संवेदना नहीं है। यकीन मानिये इस जवान के भी एक बूढ़ी माँ और बहन है। फिर हमारी सलामती के लिए अपनी जान पर खेलने वाले वीर सोहन सिंह और इसके परिवार के लिए हमारी संवेदनाएं और सहानुभूति कहाँ मर गई?

ये किस दिशा में जा रहा है, हमारा समाज:

आज प्रदेश में एक अपराधी की मौत पर जाति-समाज, क्षेत्र के नाम पर प्रदर्शनकारियों का प्रदर्शन और ईमानदार सरकार व जांबाज़ कर्तव्यनिष्ठ पुलिस का विरोध चल रहा है। साथ ही मेरे मन में भी अनेकों सवाल चल रहे हैं। ”अपनी पीढ़ियों, अपने बच्चों, अपने नुमाइंदगों को हम किस ओर धकेल रहे है?” ”अपराध और असामाजिकता की पैरवी कर इस भारतीयता के पावन समाज को किस दिशा में लेकर जा रहें है? क्या एक अमानुष आनंदपाल का समर्थन कर हम पराक्रमी सोहन सिंह को मार देना चाहते है? आख़िर हमारे दिमाग में बुराई का फितूर क्यों चढ़ा हुआ है? ये किस रास्ते पर लेकर जा रहे है हम हमारे समाज और हमारे देशवासियों को, जहाँ संविधान और क़ानून जैसे लफ़्ज़ों की कोई कीमत नहीं रहती। अब अंत में सवाल है, एक गैंगस्टर की नुमाइंदगी में डूबे हुए लोगों से- ”क्या आनंदपाल समर्थक अपने बच्चों को भी एक बेरहम अमानवीय हत्यारा बनाना चाहेंगे?”

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