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इन दिनों भारत का उच्चतम न्यायालय देश के नागरिकों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों  के चरित्र को पवित्र बनाने पर काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में पिछले दिनों एक याचिका दायर की गई थी। याचिका में न्यायप्रणाली से एक ऐसा क़ानून बनाने की बात की गई है जिसके अनुसार आपराधिक केस में दोषी पाए गए प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाने की मांग की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि वे लोग जो आपराधिक मुक़दमे में दो साल से ज़्यादा की सजा काट चुके है, उनके चुनाव लड़ने पर आजीवन पाबंदी लगाई जाये। उच्चतम न्यायलय इस याचिका पर गंभीरता से सुनवाई कर रही है। क्योंकि देश को चलने वाली सरकार और विधायिका के सदस्य ही अगर अपराध की नुमाइंदगी करेंगे तो इससे देश के आमजन पर असामाजिकता का असर तो पड़ेगा ही।

सरकार और चुनाव आयोग से मांगे सुझाव:

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट क़ानून निर्माण पर सरकार और चुनाव आयोग से सुझाव मांगे है। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता अश्विनी उपाधध्याय ने वर्तमान सरकारी क़ानून के खिलाफ याचिका दायर की थी। जिसके अनुसार दो साल से अधिक सजा काट चुके व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर छह वर्ष की पाबंदी होती है। याचिका में कहा गया है कि देशवासियों के अलग-अलग तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले इन लोगों पर आपराधिक केस होने पर गंभीर विचार करके उन लोगों पर चुनावों में भाग लेने पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से अपने-अपने सुझाव मांगे है। अपराध करके सज़ा काटकर, क्षेत्र में बाहुबली के रूप में धाक जमाकर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश की वर्तमान लोकसभा में 186 सांसद और केंद्रीय मंत्रिमण्डल में 24 मंत्री ऐसे है जिनके ख़िलाफ़ अपराधिक मामले चल रहे हैं। ऐसे में जब देश में कोई अपराध किया हुआ व्यक्ति सरकारी महकमे में एक चपरासी नहीं बन सकता तो देश का शासन चलने वालों में उसे जगह देना कहाँ तक उचित है?

चुनाव आयोग को जवाब न देने पर फटकार लगाईं थी:

दोषी नेताओं के चुनाव न लड़ने पर ताउम्र बैन लगाने के इस मसले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग से सवाल-जवाब किये। इस पर शीर्ष कोर्ट ने आयोग को अपना रुख़ स्पष्ट करने को कहा था। जस्टिस रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की बेंच ने कहा कि इस मामले पर चुनाव आयोग चुप नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि आयोग के ऊपर विधायिका या किसी अन्य का दबाव है तो स्पष्ट बताये। आयोग साफ़-साफ़ बताये कि वह इस याचिका की मांग के पक्ष में है या नहीं।

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