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श्रद्धा व भक्ति का महाकुम्भ साम्प्रदायिक सद्भाव व जन -जन की आस्था के प्रतीक के रुप में प्रसिद्ध गोगामेड़ी धाम अपने आप में ही खास है। यहां प्रदेश के विभिन्न हिस्सों के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, दिल्ली, पंजाब व हरियाणा आदि राज्यों से लाखों श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ला पूर्णिमा तक गोगामेडी में भरने वाले इस मेले में लोग सर्वधर्म सम्भाव व राष्ट्रीय एकता की जीवंत पहचान लोक देवता वीर गोगाजी की समाधि तथा गोरखटीला पर स्थित गुरुगोरक्षनाथ के धूणे पर शीश नवाकर मनौतियां मांगते हैं। राजस्थान के इस खास मंदिर में भगवान का भोग(प्रसाद) के रुप में प्याज चढ़ाया जाता है। जी हां बात हैरान करने वाली है लेकिन सत्य है। गोगामेड़ी मंदिर में भगवान को बरसों से प्याज का ही भोग अर्पित किया जा रहा है। राजस्थान के कई शहरों में पीली मिट्टी से बनी गोगाजी की प्रतिमा को पूजने की परम्परा है। गोगाजी को हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय मानते है। खास यह है कि गोगाजी के मन्दिर में प्रसाद के रूप में प्याज, दाल और चावल की खील चढ़ती है।

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जाने कौन है गोगाजी?

राजस्थान के चुरू जिले में स्थित ददरेवा में गोगाजी का जन्म चौहान वंश के राजपूत शासक जैबर (जेवरसिंह) सिंह के घर में भादवा सुदी नवमी सम्वत 1003 को हुआ। कहा जाता है कि जेवर सिंह की पत्नी बाछल के संतान नहीं हो रही थी। उन दिनों ददरेवा से करीब 80 किलोमीटर दूर हनुमानगढ़ जिले के ‘गोगामेडी’ के टीले पर गुरू गोरखनाथ तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान देते हुए एक गुग्गल फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और गोगाजी का जन्म हुआ। गुग्गल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे और उनका राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था।

सांपों के देवता के रूप में होती हैं गोगाजी की पूजा

लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर मौजूद है। जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है।

प्याज, दाल और चावल की खील का प्रसाद चढ़ता है

आमतौर पर मन्दिरों में मिठाई, नारियल, चावल की खील, बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है लेकिन गोगामेडी में प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल (खील) का प्रसाद चढ़ाया जाता है। गोरक्षनाथ टीले पर भी पर यही तीनों चीजें प्रमुखता से चढ़ाई जाती हैं। इस संबंध में मान्यता है कि गोगाजी की जब मोहम्मद गजनवी से लड़ाई तय हो गई थी, तब उन्होंने अपने सगे-संबंधियों और मददगारों को रसद सामग्री के साथ युद्ध में आने का निमंत्रण दिया था। लेकिन, लड़ाई समय से पूर्व शुरू हो गई और दुश्मन ने धोखे से गोगाजी को घेर लिया गया। गोगाजी ने घोड़े सहित समाधि ले ली। जब युद्ध समाप्ति हो गया तो उनके सगे संबंधियों एवं मददगारों ने रसद सामग्री के रूप में साथ लाए गए प्याज, दाल एवं भुने हुए चावल उनकी समाधि पर अर्पित कर दिए। तभी से यह परम्परा चली आ रही है।

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