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यह कहानी है दिल्ली के रहने वाले 39 वर्षीय संजय शर्मा की। बचपन में पैसों की तंगी के बावजूद मेहनत में कमी नहीं की। 12वीं कक्षा तक दिल्ली की सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। 12 वीं तक लगातार अव्वल रहे। फिर अपने हुनर के दम पर स्कॉलरशिप लेकर अमेरिका चले गए। स्कॉलरशिप के सहारे अमेरिका के बोस्टन में सामाजिक विकास एवं अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन की। अमेरिका में ही टीचर बन गए। वहां 2 लाख 70 हजार रुपए मासिक तनख्वाह पर नौकरी की। एक दिन अपने देश भारत के प्रति मन में सेवा का भाव आया। अगले ही दिन नौकरी छोड़ दी। अपने देश भारत लौट आए। तब से लेकर आज तक लगातार राजस्थान के धौलपुर जिला स्थित डांग नामक ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को सक्षम एवं सशक्त बनाने के लिए काम कर रहे हैं। संजय की मेहनत और समर्पण का परिणाम यह हुआ कि आज क्षेत्र की महिलाए अच्छा कमा रही है और तकनीकी में भी हाथ आज़माने लगी है।

देशप्रेम का पाठ पढ़ाते हुए जगी प्रेरणा:

अमेरिका में पढ़ाई पूरी होने के बाद जब 2 लाख 70 हजार रूपए प्रतिमाह के वेतन पर नौकरी लग गई तो संजय वहीँ बोस्टन में पढ़ाने लग गए। एक दिन अपनी कक्षा में संजय देश प्रेम का पाठ पढ़ा रहे थे। अचानक उस समय मन में अपनी मातृभूमि भारत के लिए ख्याल आया। अपने समाज, अपने देश के प्रति हुए फ़र्ज़ के अहसास के बाद संजय ने बिलकुल देर नहीं की। अगले ही दिन नौकरी से इस्तीफा दिया और लौट आये अपने देश भारत।

धौलपुर ज़िलें की महिलाओं को बनाया सशक्त:

संजय आज से 15 साल पहले साल 2002 में भारत लौट आए थे। पहले एक सामाजिक संस्था में नौकरी की। उस नौकरी में पहली नियुक्ति धौलपुर जिले के ग्रामीण इलाके डांग में हुई। उस दिन से लेकर आज का दिन है, संजय लगातार यहां काम कर रहे हैं। अपने समर्पण, लगन, साहस और कौशल के बल पर संजय ने ज़िलें के 562 गांव की 54 हजार महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाया हैं। संजय ने क्षेत्र की ग्रामीण महिलाओं को डेयरी उद्योग, बक्सा बैंक, बकरी पालन, कृषि सखी, पशु सखी आदि नवाचार के माध्यम से समाज की मुख्य धारा से जोड़ा। क्षेत्र की महिलाओं को गूगल इंडिया के साथ मिलकर टेबलेट, मोबाइल और इंटरनेट चलाना सिखाया है। संजय के प्रयासों से धौलपुर ज़िले की 562 गांव की 54 हजार महिलाओं का आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक स्तर उन्नत हुआ है।

जब देश में रियायत मिली तो देश की ही सेवा करूँगा:

संजय ने बताया कि बचपन में आर्थिक तंगी के कारण मैंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की। वहां देशवासियों के टैक्स से सरकार ने मुझे रियायत दी। आगे इसी देश से स्कॉलरशिप लेने में सफल हुआ। इसलिए मैंने सोचा कि अपने देश और समाज का ऋण है मुझ पर। अब देशवासियों की स्थितियों में सुधार लाना मेरा लक्ष्य है। इसी सोच के साथ मै फिर से अपने वतन भारत लौटा। इस देश के प्रति मेरे फर्ज और ज़िम्मेदारियाँ है और मुझे इसका अहसास है।

शुरू में भारी विरोध हुआ, लेकिन लोगों को समझाते रहे:

संजय ने बताया कि डांग में जब काम करने लगा तो उस समय तक यहाँ अशिक्षा के चलते महिलाओं का बाहरी पुरूषों से बात करना भी मना था। उस समय ग्रामीणों ने भारी विरोध किया। कई बार गांव से भगाया भी गया। लेकिन हिमायत न हारते हुए मैंने अपनी कोशिश ज़ारी राखी। लोगों को कई बार समझाया।

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