एनडीटीवी न्यूज चैनल पर केन्द्रीय सरकार ने 9 नवम्बर को जो एक दिन का प्रतिबंध लगाया है उसे कुछ लोग प्रेस की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं। विपक्षी राजनीति दलों के नेताओं को तो नरेन्द्र मोदी की सरकार पर हमला करने का अवसर मिल गया है। चूंकि छोटे से छोटे नेता का बयान एनडीटीवी पर प्रसारित हो रहा है, इसलिए कोई भी नेता सरकार की आलोचना करने में पीछे नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या एनडीटीवी का बैन प्रेस की आजादी से जुड़ा है? सब जानते है कि पंजाब के पठानकोट एयरबेस पर जब आतंकी हमला हुआ तो एनडीटीवी ने ऐसे फुटेज प्रसारित किए जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक थे। जब भी कोई आतंकी हमला होता है तब आतंकी पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से दिशा निर्देश प्राप्त करते रहते हैं। पठानकोट के हमले के वक्त एनडीटीवी जो फुटेज दिखा रहा था उससे आतंकवादियों को भारतीय सुरक्षा बलों के एक्शन के बारे में जानकारी हो रही थी। एनडीटीवी का प्रसारण उस समय पूरी तरह देश की सुरक्षा के खिलाफ था। क्या किसी चैनल को देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का अधिकार है? एनडीटीवी के बैन को प्रेस की आजादी से जोडऩा गलत होगा क्योंकि प्रेस की आजादी की वजह से ही एबीपी, आज तक जैसे बड़े न्यूज चैनल सरकार की नीतियों की खुली आलोचना करते हंै। जो लोग चैनलों पर न्यूज देखते है उन्हें पता है कि आज तक और एबीपी चैनलों पर किस तरह से सरकार की आलोचना होती है। सरकार ने ऐसे विरोधी चैनलों पर तो बैन नहीं लगाया। मानाकि एनडीटीवी के प्रबंधकों की शुरू से ही नरेन्द्र मोदी की सरकार से पटरी नहीं बैठी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि एनडीटीवी देश सुरक्षा को ही खतरे में डाल दे। पूरी दुनिया में भारत ऐसा देश होगा, जहां देश की एकता और अखंडता को तोडऩे के प्रयासों की भी खुली छूट मिली हुई है। इसलिए अब एनडीटीवी कह रहा है कि सरकार के बैन के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी। समझ में नहीं आता कि भारत मेें देशभक्ति को पहली प्राथमिकता कब मिलेगी।
कांग्रेस ने तो इमरजेन्सी लगाई थी :

एनडीटीवी के बैन पर कांग्रेस के नेता भी हल्ला मचा रहे हंै। जबकि कांग्रेस ने तो 1975 में इमरजेन्सी लगाकर प्रेस का गला ही घोट दिया था। आज वहीं कांग्रेस प्रेस की आजादी की वकालत कर रही है।

(एस.पी.मित्तल)

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