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कई दशकों तक कांग्रेस को चलाने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अब नए दौर के कांग्रेसियों के साथ ताममेल बिठाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। कांग्रेस में एक दौर था जब इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और संजय गांधी को देश का भविष्य़ मान लिया गया था और इन्ही के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले आज वर्तमान कांग्रेस के दुर्भाग्य का दंश झेल रहे है। वर्तमान दौर राहुल गांधी का है। राहुल गांधी कांग्रेस के युवा चेहरे है और सोनिया गांधी को पूरानी कांग्रेस के तौर पर देश भर में पहचान मिली हुई है। कुछ यही दृश्य राजस्थान में भी कांग्रेस का दिखाई देता है। राजस्थान कई सालों से कांग्रेस का गढ़ रहा है।

नए दौर की कांग्रेस को नजर नही आ रहे अशोक गहलोत

राजपूताना राज्य होने के कारण कांग्रेस को यहां अपनी जड़े जमाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन फिर भी कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के दौर में राजस्थान में अपने आप को गहरा कर लिया था। ये दौर था पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का। राजस्थान में अगर कांग्रेस को जाना जाता है तो सिर्फ अशोक गहलोत के चेहरे से। कांग्रेस का पुराना नाम अशोक गहलोत ही थे लेकिन अब नए दौर की कांग्रेस को अशोक गहलोत नजर नही आ रहे है। राजस्थान में भी कांग्रेस अपनी आपसी विचारधारा के साथ नए और पुराने कार्यकर्ताओं की जंग लड़ रही है जिसमें कहीं ने कहीं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की हार हो चुकी है।

अस्सी के दशक और 21वीं सदी की कांग्रेस में मतभेद

समय के साथ कांग्रेस पार्टी में भी कई बदलावों का दौर देखा है। राजस्थान में काग्रेस की बुनियाद के बाद धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हुई। कारण सिर्फ इतना सा रहा है कि कहीं न कहीं पार्टी की विचारधारा और पार्टी के कार्यकर्ताओं की सोच में परिवर्तन आना। यानी साफ कहा जा सकता है कि अस्सी के दशक की कांग्रेस और वर्तमान कांग्रेस में विचारधारा का आंतरिक युद्घ चल रहा है। प्रदेश में कांग्रेस के चेहरे के तौर पर अपनी पहचाना बना चुके पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत साइडलाइन कर दिए गए है ठीक वैसे ही जैसे केंद्रीय कांग्रेस के युवा चेहरे राहुल गांधी ने सोनिया गांधी को सालों साल कांग्रेस के बिस्सेसर रहे नेताओं को कर दिया गया।

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राजस्थान में बदला कांग्रेस का चेहरा, इन नेताओं की कर दी छुट्टी

राजस्थान में कांग्रेस की बागडोर युवा नेता सचिन पायलट को सौंप दी गई है और गहलोत को ससम्मान दूसरे प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी गई। वहीं राजस्थान के प्रभारी रहे गुरुदास कामत को भी अपनी बढ़ती उम्र का नुकसान भुगतना पड़ा। यह हम नही कह रहे लेकिन जमाना कह रहा है कि कांग्रेस में अब पहले वाली बात नही । हां तो कांग्रेस के युवा नेतृत्व ने कामत को बदल युवा चेहरे अविनाश पांड़े को राजस्थान प्रभारी की कमान सौंप दी। जाहिर है अशोक गहलोत के साथ कामत अच्छा काम कर रहे थे क्योंकि विचारधारा और अस्सी के दशक का संघर्ष जो साथ किया था। लेकिन फिर कांग्रेस के युवा चेहरे और राजस्थान में कांग्रेस के कप्तान पायलट के साथ कामत की जमी नही इसलिए युवा चेहरे पांडे को बुलाया गया। इसके बाद गहलोत और कामत दोनों की राजस्थान से छुट्टी कर दी गई।

युवा विचारधारा-युवा सोच, तालमेल नही होने से बुजुर्गों की फौज हुई रिटायर

आखिर कांग्रेस में नए पुरानों की लड़ाई क्यों शुरू हो गई। आखिर कांग्रेस ने पुराने और अनुभवी चेहरों को क्यों बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। इन सवालों के जवाब ढुंढना शायद मुश्किल है क्योंकि कांग्रेस की सत्ता अब युवा चेहरों के हाथ में है। कांग्रेस के लिए जो काम गांधी परिवार ने उस दौर में किया था वो अब नही कर पा रहा। राहुल गांधी इकलौते शासक है जो कांग्रेस की कमान गांधी परिवार की ओर से संभाल रहे है। अब जब कांग्रेस में पीढियों का फर्क आ गया है तो जाहिर है सोच और विचारधारा का भी बदलना जायज है। कांग्रेस के युवा नेताओं की सोच और विचारधारा पुराने नेताओं के कुछ अलग है जिसके तहत कार्य करने में पुराने लोग बाधा बन रहे है। ऐसे में पुराने लोगों को ठिकान लगकार कांग्रेस का पुर्निर्माण किया जा रहा है। और प्रधानमंत्री मोदी एवं मुख्यमंत्री राजे के सामने कांग्रेस की एक नई सेना खड़ी करेगी।

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