मेहरानगढ़ दुखांतिका: चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर सरकार का झूठ, विधानसभा में रखने से भी किया मना

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जयपुर। आज से करीब 11 वर्ष पहले जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित चामुंडा माता मंदिर में मची भगदड़ को भला कौन भूल सकता है। प्रथम नवरात्रि के दिन हुई इस त्रासदी में करीब 216 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी वहीं सैंकड़ों लोग घायल हुए थे। हादसे को एक दशक से ज्यादा बीत जाने के बावजूद भी अब तक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस अवधि में भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारें बनीं लेकिन दोनों ही सरकारों ने प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा जताते हुए रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना कर दिया। अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद चौपड़ा आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट को सबके सामने नहीं रखने का मामला एक बार फिर चर्चा में हैं।

एक माह में रिपोर्ट सार्वजनिक करने के वादे से पलटी गहलोत सरकार
30 सितंबर 2008 को हुई इस विभत्स दुर्घटना में भाजपा सरकार ने पूर्व न्यायाधीश जसराज चौपड़ा के नेतृत्व में एक आयोग का गठन कर जांच शुरू कर दी थी। लेकिन इसके दो महीने बाद आई कांग्रेस सरकार मामले पर अभी तक अपनी स्पष्ट राय नहीं रख पाई है। प्रकरण की पहली रिपोर्ट 11 मई 2011 को आई थी, जिसमें जस्टिस जसराज आयोग ने 860 पन्नों की एक रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंपी थी। सरकार ने तीन माह तक इसका विश्लेषण किया तथा मार्च, 2012 में कहा कि चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को एक महीने के अंदर सार्वजनिक कर दिया जाएगा। लेकिन कुछ दिन बाद ही कई तरह के जोखिमों का हवाला देते हुए सरकार अपनी बात से पलट गई।

रिपोर्ट विधानसभा में रखने के फैसले पर भी लिया यू-टर्न
राजस्थान हाईकोर्ट ने मंगलवार को हादसे के कारणों की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से दोबारा रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण मांगा। जवाब में राज्य सरकार ने कहा कि आयोग के गठन की प्रकृति ऐसी है कि इसकी रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखने की आवश्यकता नहीं है। कैबिनेट के निर्णय के हवाले से राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में अतिरिक्त शपथ पत्र पेश कर कहा कि वसुंधरा सरकार द्वारा चौपड़ा जांच आयोग का गठन एक प्रशासनिक निर्णय था। क्योंकि इस संबंध में ना तो विधानसभा में कोई प्रस्ताव पारित किया गया था और ना ही मंत्रिमंडल से मंजूरी ली गई थी। इसलिए रिपोर्ट को विधानसभा में नहीं रखा जा सकता। जबकि पांच साल पहले सरकार ने ही विधानसभा कार्रवाई के दौरान माना था कि चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखने की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है। विधानसभा में दिए जवाब से स्पष्ट था कि पांच वर्ष पहले सरकार रिपोर्ट को विधानसभा में रखने के लिए तैयार थी। लेकिन अब गहलोत सरकार ने एक बार फिर अपने पूर्ववर्ती निर्णय से यू-टर्न ले लिया है।

शांति धारीवाल ने कानून व्यवस्था बिगड़ने का जताया अंदेशा
मेहरानगढ़ दुखांतिका के मामले में गठित दूसरी सब कमेटी की रिपोर्ट पर गहलोत सरकार के मंत्री शांति धारीवाल ने स्पष्ट कहा है कि रिपोर्ट को किसी भी हालत में विधानसभा में नहीं रखा जा सकता। बताया जा रहा है कि रिपोर्ट के भाग-2 में वर्णित कुछ तथ्य अनुमानों और मिथकों पर आधारित हैं, जिन्हें यदि पब्लिक डोमेन में रखा गया तो इससे जनता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। जिसके परिणामस्वरूप प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।

मेहरानगढ़ हादसे के मुख्य बिंदू

– 30 सितंबर, 2008 को जोधपुर के मेहरानगढ़ स्थित चामुंडा माता मंदिर में भगदड़ मची।

– हादसा नवरात्रि के पहले दिन हुआ, जिसमें 216 लोगों की मौत हो गई।

– तत्कालीन भाजपा सरकार ने अक्टूबर 2008 में जस्टिस चौपड़ा आयोग का गठन कर शीघ्र जांच के आदेश दिए।

– आयोग ने त्रासदी की जांच कर 5 मई, 2011 को कांग्रेस शासन के समय अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

– कांग्रेस सरकार ने रिपोर्ट से जोखिम होने का अंदेशा जताते हुए सार्वजनिक करने से मना कर दिया।

– बाद में भाजपा सरकार ने भी माना कि रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो राजस्थान में कानून व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

– भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारों ने चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना कर दिया, जिसके कारण किसी पर दोष तय नहीं हो पाए।

– 30 जुलाई 2019 को राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को बंद लिफाफे में रिपोर्ट अदालत में पेश करने के आदेश दिए।

– मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को तय की गई है।

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