24 अक्टूबर को यूपी की राजधानी लखनऊ में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेताओं ने जो कुछ भी किया, उसे लोकतंत्र का मजाक उड़ाना ही कहा जाएगा। मुलायम सिंह और उनका कुनबा ऐसे लड़ रहा है जैसे जंगल में अपने क्षेत्राधिकार को लेकर जानवर ताकत का प्रदर्शन करते हैं। 24 अक्टूबर को टीवी चैनलों पर जो कुछ भी दिखा, वह हकीकत नहीं है। मुलायम सिंह और शिवपाल इस तैयारी के साथ बैठक में उपस्थित थे कि अखिलेश के स्थान पर मुलायम को सीएम बना दिया जाएगा लेकिन अखिलेश ने बैठक शुरू होने से पहले ही धमकी दे दी कि यदि उन्हें हटाया गया तो वे राज्यपाल से विधानसभा को भंग करने की मांग कर चुनाव करवाने के लिए कह देंगे। मुलायम और शिवपाल भी यह जानते है कि इस समय अखिलेश के पीछे भाजपा भी खड़ी है। चूंकि इस समय यूपी के राज्यपाल के पद पर भाजपा के दिग्गज नेता रहे राम नाईक विराजमान हैं इसलिए मुख्यमंत्री की हैसियत से अखिलेश यादव जो प्रस्ताव रखेंगे। उस पर राज्यपाल सहमति जता देंगे। अखिलेश को भाजपा का साथ है,जो इस बात को आज की बैठक में शिवपाल ने स्वीकार भी किया। शिवपाल ने कहा कि मैं अपने बच्चों की कसम खाकर कहता हूं कि अखिलेश ने नई पार्टी बनाने की बात कही थी और रामगोपाल यादव भाजपा के बड़े नेताओं के सम्पर्क में है। जानकारों की माने तो अखिलेश को इस धमकी के बाद मुलायम और शिवपाल खामोश हो गए। दोनों भाई नहीं चाहते थे कि यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू हो या चुनाव तक अखिलेश काम चलाऊ सरकार चलाएं। चूंकि अगले वर्ष शुरू मे ही यूपी में विधानसभा के चुनाव होने है, इसलिए राज्यपाल को भी अखिलेश का प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं होगी। ऐसे में सत्ता की डोर पूरी तरह मुलायम और शिवपाल के हाथ से निकल जाती। यही वजह रही कि 24 अक्टूबर की बैठक में दोनों भाईयों ने सिर्फ लीपापोती का काम किया, जबकि अखिलेश यादव ने साफ-साफ कह दिया कि सरकार में उन्हीं की चलेगी। वैसे भी इतने लोगों की उपस्थिति में पिता, पुत्र और चाचा, भतीजे में कोई बात होने वाली नहीं थी। यदि कोई समझौता होना है तो इन तीनों के बीच बंद कमरे में बात होनी चाहिए। बदली हुई परिस्थितियों में अब मुलायम सिंह अपने पुत्र अखिलेश को ही समझाने के प्रयास शांतिपूर्ण तरीके से करेंगे। 24 अक्टूबर को तीनों नेताओं ने जो भाषण दिया, वह वर्तमान परिस्थितियों में कोई मायने नहीं रखता है।
(एस.पी. मित्तल)

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