आस्था का प्रतीक है अजमेर का पुष्कर मेला, 28 से होगी शुरूआत।

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आस्था का प्रतीक पुष्कर मेला, 28 से होगी शुरूआत 

वैसे तो राजस्थान का अजमेर जिला अपनी विरासत और पवित्र झील के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अजमेर से करीब 11 किमी दूर स्थित पुष्कर कस्बे में बसे दुनिया के इकलौते ब्रह्मा मंदिर को 5वां धाम माना जाता है और जिसके दर्शन न करने से चारों धाम की यात्रा भी अधूरी ही मानी जाती है। इसी जगह पर मनाया जाता है पुष्कर फेयर जो राजस्थानी संस्कृति का जीता जागता उदाहरण है। यहां रंग—बिरंगे परम्परागत लिबास व पगड़ी में सजे महिला और पुरूषों को देख राजस्थानी संस्कृति के जीवंत होने का प्रमाण मिलता है। इसके साथ ही भारी संख्या में गाय, बैल, भेड़, बकरियां, घोड़े व और ऊंट भी यहां लाए और खरीदे—बेचें जाते हैं।
कार्तिक शुल्क की एकादशी को शुरू होता है पुष्कर मेला –
पवित्र झील पुष्कर के तट पर आयोजित होने वाला पुष्कर मेला कई सदियों से बिना रूके मनाया जाता रहा है। खास बात यह है कि इसे कई एक समान तारीख पर नहीं मनाया जाता बल्कि तिथियों के अनुसार अति उत्साह व हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। यह मेला हिन्दी महीनों के अनुसार कार्तिक शुक्ल महीने की एकादशी को शुरू होता है और कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। इस साल आयोजित होने वाला आस्था का प्रतीक पुष्कर मेला 28 अक्टूबर को शुरू होगा जो 4 नवम्बर तक चलेगा।

मान्यताओं से भरी है पुष्कर झील की कहानी –
मान्यता है कि कार्तिक महीने में पुष्कर मेले के दौरान 330 करोड़ हिन्दू देवी—देवता धरती पर उतरते हैं और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। एक मान्यता यह भी है कि एक बार भगवान ब्रह्माजी महायज्ञ करने के लिए एक पवित्र जगह की तलाश कर रहे थे। उस समय उन्होंने एक हंस का निर्माण किया जिसकी चोंच में एक कमल था। ब्रह्माजी ने उस कमल को पृथ्वी पर गिरा दिया और जहां वह कमल गिरा वहां एक झील का निर्माण हो गया। जहां वह कमल गिरा वह जगह पुष्कर थी और वह झील पुष्कर झील के नाम से प्रसिद्ध हो गई। बताया जाता है कि जिस कमल के फूल को नीचे धरती पर गिराया गया था, वह नीले रंग का था और पुष्कर का संस्कृत में शाब्दिक अर्थ होता है नीले रंग का फूल।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी ने एक दैत्य को मारने के लिए एक कमल का निर्माण किया। निर्माण के दौरान इस फूल की तीन पत्तियां पुष्कर के पास गिर गई। दैत्य से इन तीनों स्थानों को बचाने के लिए ब्रह्माजी ने एक यज्ञ करने का फैसला लिया। जब आहूती देने का समय आया तो उनकी धर्मपत्नी सरस्वती वहां उपस्थित नहीं थी। ऐसे में ब्रह्माजी ने आस्था का प्रतीक पुष्कर कस्बे की रहने वाली एक गुर्जर समाज की युवती से विवाह कर लिया और आहूति पूर्ण कर ली। सरस्वतीजी यह देखकर क्रोधित हो गईं और ब्रह्माजी को श्राप दिया कि पुष्कर को छोड़कर पूरे विश्व में कहीं भी उनकी पूजा नहीं होगी। यह बात सत्य साबित हुई और पुष्कर को छोड़कर दुनियाभर में और कहीं ब्रह्माजी का कोई मंदिर तक नहीं है और गुर्जर समाज को छोड़कर न ही कोई उनकी पूजा करता है।

मूंछ प्रतियोगिता और ऊंट पोलो मैच आकर्षण का केन्द्र –

इस मेले में स्थानीय लोग ही नहीं, देश—विदेश से हजारों लोग यहां शामिल होते हैं। इस मेले में भारी मात्रा में राजस्थानी परम्परागत कपड़े, ज्वैलरी, स्टोन, स्थानीय क्राफ्ट व नक्काशी के साथ पशु आदि बेचे और खरीदे जाते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी यहां जमकर आयोजन किया जाता है। इनके अलावा, ऊंटों की दौड़, ऊंट पोलो मैच, फॉक नृत्य प्रतियोगिता, पपेट शो, पशुओं की सबसे अच्छी नस्ल प्रतियोगिता, दुल्हन प्रतियोगिता, मूंछ प्रतियोगिता और टेटू प्रतियोगिता जैसी नजारे यहां देखने को मिलते हैं जो विश्व में यही मौजूद हैं।

 

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